महिला क्रिकेट टीम को कॉमनवेल्थ गेम्स से क्या हासिल होगा?

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
कॉमनवेल्थ खेलों में अब तक एथलेटिक्स, बैडमिंटन, बास्केटबॉल, बॉक्सिंग और डाइविंग जैसे खेल देखने को मिलते थे. लेकिन अब इन खेलों में टी-20 क्रिकेट का रोमांच भी देखने को मिलेगा.
वर्ष 2022 में बर्मिंघम में होने वाले कॉमनवेल्थ खेलों में महिला क्रिकेट को भी शामिल किया जा रहा है. इसमें भारतीय महिला क्रिकेट टीम भी टी-20 मुक़ाबले में हिस्सा लेगी.
भारतीय महिला क्रिकेट के इतिहास में ये पहली बार होगा कि महिला खिलाड़ी भी कॉमनवेल्थ खेलों में अपना हुनर दिखा पाएंगी.
भारतीय महिला क्रिकेट टीम 1976 में पहला अंतरराष्ट्रीय टेस्ट मैच खेलने के बाद से अब 2022 में उन्हें कॉमनवेल्थ खेलों में ये मौक़ा दिया गया है.
वर्ष 1998 में कॉमनवेल्थ खेलों में एक बार पहले भी भारतीय क्रिकेट टीम को भेजा गया था लेकिन तब सिर्फ़ पुरुष टीम ही इसका हिस्सा बनी थी. उस समय वनडे मैच खेले गए थे.
अगले कॉमनवेल्थ खेलों में भारत सहित आठ देश मुक़ाबले में उतरेंगे. इसमें इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसी मज़बूत टीमें भी होंगी.
लेकिन, इस बार सिर्फ़ महिला टीम को ही कॉमनवेल्थ खेलों में शामिल किया जा रहा है. पुरुष टीम इसका हिस्सा नहीं है.
ऐसे में अपनी पहचान के लिए संघर्ष करती महिला क्रिकेट टीम के लिए कॉमनवेल्थ खेलों में शामिल होने का ये मौक़ा ख़ास क्यों है और वो इस मंच से क्या हासिल कर पाएंगी?

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विश्वस्तरीय पहचान
वरिष्ठ खेल पत्रकार प्रदीप मैगज़ीन इसे महिला क्रिकेट टीम के लिए एक बहुत अच्छा मौक़ा मानते हैं.
वह कहते हैं, "कॉमनवेल्थ खेलों से महिला खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय पहचान पाने का एक बड़ा मौक़ा मिलेगा. पूरी दुनिया की इन खेलों पर नज़र होती है, उसकी लाइव कवरेज़ की जाती है. अगर इसमें भारत जीत गया तो भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए ये एक अच्छा एक्सपोजर होगा. हालांकि ये थोड़ा मुश्किल है क्योंकि उनका मुक़ाबला इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसी टीमों से भी होने वाला है."
भारत में महिला क्रिकेट अस्तित्व में आने के कई दशकों बाद ये फ़ैसला लिया गया है. प्रदीप मैगज़ीन मानते हैं कि अब महिला क्रिकेट पर गंभीरता से सोचा जा रहा है.
लंबे समय तक भारत में महिला और पुरुष क्रिकेट के लिए अलग-अलग एसोसिएशन हुआ करती थीं. महिला क्रिकेट, वुमन्स क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के तहत संचालित होता था जिसका गठन 1973 में हुआ था. बताया जाता है कि इसके भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई में मिलने के बाद से महिला क्रिकेट की स्थिति में सुधार हुआ है.

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प्रदीप मैगज़ीन ने बताया, "महिला क्रिकेट को बढ़ावा देने के लिए इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल ने फ़ैसला किया था कि महिला और पुरुष क्रिकेट जहां भी होता है उसे एक ही बोर्ड चलाएगा. इसी के तहत महिलाओं की एसोसिएशन को साल 2006 में बीसीसीआई में मिला दिया गया."
"इस क़दम से महिला क्रिकेट की स्थिति में सुधार हुआ है. वो मैच भी ज़्यादा खेल रही हैं और बाहर भी जा रही हैं. बीसीसीआई के पास पैसा ज़्यादा है तो महिला क्रिकेट पर पर ख़र्च भी ज़्यादा हो रहा है."
वहीं, पूर्व क्रिकेटर और स्टेट कोच ख्याती गुलानी कहती हैं, "बीसीसीआई किसी अन्य संस्थान या आयोग के तहत नहीं आना चाहता. वो अपने नियम क़ानून अपने अनुसार बनाना चाहता है. इसलिए इतने लंबे समय तक उसकी कॉमनवेल्थ खेलों से दूरी रही थी. पर आज वो उस दायरे से बाहर निकल रहा है. ये अच्छे संकेत हैं."

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क़ाबिलियत का अंदाज़ा
भारतीय महिला क्रिकेट टीम की पूर्व कप्तान अंजुम चोपड़ा कहती हैं कि अगर अपनी क़ाबिलियत मापनी है तो विश्वस्तर पर होने वाले इस तरह के टूर्नामेंट बेहद ज़रूरी होते हैं.
उन्होंने कहा, "जितने ज़्यादा टूर्नामेंट होते हैं खिलाड़ी ख़ुद को उतना टेस्ट कर पाता है. उसका अनुभव भी उतना बढ़ता है. विश्वकप और ऐसी ही विश्वस्तरीय प्रतियोगिताओं से आप ये जान पाते हैं कि आप प्रतिभा के स्तर पर दुनिया में कहां ठहरते हैं. अगर घर में ही खेलते रहेंगे तो पता ही नहीं चलेगा कि खिलाड़ी कॉलोनी के क्रिकेट में बेहतर है या देश के या विश्व के. सिरीज़ और विश्वकप के अलावा ये एक और मंच तैयार हो रहा है. खिलाड़ियों के पास अपनी प्रतिभा दिखाने का एक और मौक़ा है."

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अंजुम चोपड़ा कहती हैं कि 'महिला क्रिकेट की हालत में धीरे-धीरे सुधार हुआ है. पिछले तीन सालों में तो काफी कुछ बदला है. खिलाड़ियों को भी अब ख़ुद को साबित करना होगा. अगर भारतीय महिला टीम कोई भी विश्वस्तरीय प्रतियोगिता जीतती है तो स्थितियां तेज़ी से बेहतर होंगी. जीत के बाद से लोगों का आपके प्रति नज़रिया ही बदल जाता है.'
अंजुम चोपड़ा इस फ़ैसले को इसलिए भी महत्वपूर्ण मानती हैं कि इस बार पुरुष टीम के साथ न होने पर भी महिला टीम को भेजा जा रहा है.
उन्होंने बताया कि 2010 के एशियन गेम्स में महिला क्रिकेट टीम को भेजने की बात हुई थी लेकिन तब पुरुषों की टीम किसी और सिरीज़ में व्यस्त थी. तब कहा गया था कि अगर जाएंगी तो दोनों टीम जाएंगी वरना कोई नहीं. आज अगर पुरुष टीम के न जाने के बावजूद भी महिला टीम को भेजा जा रहा है तो ये अपने आप में प्रगति है.

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पुरुष टीम क्यों नहीं
लेकिन, सालभर हर तरह के क्रिकेट टूर्नामेंट खेलने वाली पुरुष क्रिकेट टीम को कॉमनवेल्थ खेलों से दूर क्यों रखा गया है.
क्रिकेट के जानकार इसके पीछे कई तरह की वजह बताते हैं.
प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं, "भारतीय बोर्ड नहीं चाहता कि टी-20 मैच ज़्यादा खेले जाएं जिससे कि उसका महत्व कम न हो जाए. चर्चा ये भी है कि आईसीसी ओलंपिक्स में भी टी-20 शामिल करना चाहती है लेकिन पुरुष क्रिकेट को ओलंपिक्स की भी इतनी ज़रूरत नहीं है. वो पहले से ही बेहद लोकप्रिय है और खिलाड़ी अच्छा पैसा कमाते हैं."
पूर्व महिला क्रिकेटर और स्टेट कोच ख्याति गुलानी भी कहती हैं कि पुरुष टीम के पास समय बहुत कम होता है. उनके दो-तीन साल के शेड्यूल पहले से तय होते हैं. इसलिए कॉमनवेल्थ खेलों में उन्हें नहीं भेजा जा रहा है. इससे महिला टीम को फ़ायदा ही होगा और मीडिया का फोकस उनपर बना रहेगा."

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मंज़िल अभी दूर
कॉमनवेल्थ खेलों में महिला क्रिकेट को शामिल करना एक अच्छा क़दम माना जा रहा है पर महिला क्रिकेट अब भी पुरुष क्रिकेट से बहुत पीछे है.
ख्याति गुलानी कहती हैं, "पहचान के संकट से गुज़र रही महिला क्रिकेट टीम के साथ समस्या ये भी है कि उनके टूर्नामेंट और उनका प्रसारण दोनों कम होते हैं. इन दोनों को ही बढ़ाने की ज़रूरत है ताकि उनकी प्रतिभा ज़्यादा से ज़्यादा क्रिकेट प्रेमियों तक पहुंच सके."
उनका मानना है कि ज़मीनी स्तर पर महिला क्रिकेट को प्रमोट करना होगा. जैसे कि स्कूल और कॉलेज में. इसके अलावा महिला खिलाड़ियों के लिए नौकरियां पैदा करनी ज़रूरी हैं.
अभी सिर्फ़ रेलवे में ही उन्हें नौकरी मिलती है जबकि पुरुष खिलाड़ियों के लिए रेलवे, पुलिस, सेना और पीएसयू जैसी कई जगहें खुली हैं. महिला खिलाड़ियों के भविष्य को सुरक्षित करना होगा.
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